प्राच्य विद्या एवं भाषा विभाग द्वारा संस्कृत दिवस का आयोजन

संस्कृत भाषा के विकास से संस्कृति का उत्थान संभव: प्रो. दूगड़

लाडनूं, 22 अगस्त। आज सम्पूर्ण विष्व में लगभग 1200 भाषाएं प्रचलित हैं लेकिन इन सब भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा को ही माना जाता है। यदि हमें भारतीय संस्कृति का विकास करना है तो संस्कृत भाषा का विकास करना ही होगा। उक्त विचार जैन विष्वभारती विष्वविद्यालय के प्राच्य विद्या एवं भाषा विभाग की ओर से आयोजित संस्कृत दिवस समारोह अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने व्यक्त किये। उन्होंने संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए इसके विकास पर बल दिय एवं कहा कि संस्कृत भाषा तो सार्वकालिक है, वह कभी मर नहीं सकती। उन्होंने संस्कृत भाषा के विकास हेतु संस्थान द्वारा पूर्ण रूप से सहयोग का आष्वासन देते हुए संस्कृत भाषा को और अधिक उपयोगी बनाने पर बल दिया।

कार्यक्रम के विषिष्ट अतिथि तापड़िया संस्कृत महाविद्यालय, जसवंतगढ़ के प्राचार्य डाॅ. हेमन्त मिश्रा ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार हेतु कार्य कर रही अनेक संस्थाओं का उल्लेख करते हुए जैन विष्वभारती संस्थान द्वारा प्राच्य विद्या और भाषा के क्षेत्र में दिये गये योगदान का महत्त्व प्रतिपादित किया एवं अपने विचार व्यक्त किये। समारोह के मुख्य अतिथि अजमेर से पधारे डाॅ. राकेष कुमार शर्मा ने भी संस्कृत को भारतीय संस्कृति का मूल बताते हुए उसके विकास पर बल दिया। प्रो. दामोदर शास्त्री ने संस्कृत दिवस के महत्त्व पर प्रकाष डालते हुए वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता के बारे में बताया। विभागाध्यक्ष डाॅ. समणी संगीतप्रज्ञा ने संस्कृत को आम बोल-चाल की भाषा बनाने पर जोर देते हुए उसे ‘देववाणी’ के साथ-साथ जनवाणी के नाम से अभिहित किया। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि विभाग प्राच्यविद्याओं एवं भाषाओं के विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए कटिबद्ध है। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुमुक्षु बहिनों के मंगलाचरण से हुआ। अतिथियों को शाॅल एवं साहित्य भेंट किया गया तथा डाॅ. समणी भास्करप्रज्ञा द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। कार्यक्रम में तन्मय जैन द्वारा संस्कृत गीत तथा विभाग की मुमुक्षु बहिनों द्वारा एक संस्कृत लघु नाटिका प्रस्तुत की गई। धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया तथा कार्यक्रम का संचालन मुमुक्षु धरती एवं मुमुक्षु रोनक ने किया।

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