शिक्षा विभाग में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

शिक्षा में भारतीय मूल्यों का समावेश जरूरी: प्रो. दूगड़

लाडनूँ, 29 अगस्त। जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के अन्तर्गत ‘‘मुख्य शैक्षिक एवं सामाजिक समस्याएँ: निदान एवं उपचार’’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह के विविध सत्रों में लैंगिक असमानता, अध्यापक शिक्षा में गुणवत्ता, समावेशी शिक्षा, सांस्कृतिक प्रदूषण एवं विभिन्न सामाजिक समस्याओं से सम्बन्धित पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया गया।

अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने शिक्षा में मूल्यों के समावेश पर बल देते हुए कहा कि केवल तकनीकी विकास के स्थान पर विद्यार्थियों में अहिंसा, परस्पर सद्भाव, वैश्विक व उदात्त चिन्तन जैसे चारित्रिक मूल्यों का विकास अवश्यम्भावी है। यूनेस्को एवं विविध भारतीय एजेन्सियों के शैक्षिक क्षेत्र में दिये गये सूत्रों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्य, संपूर्ण विश्व के समक्ष समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान परिदृश्य में आवश्यकता है कि सभी अध्यापक शिक्षक, शिक्षा में भारतीय मूल्यों की पुनस्र्थापना हेतु कटिबद्ध हो।

प्रो. श्रीधर वशिष्ठ ने शिक्षा एवं समाज के परस्पर संबंधों एवं संबंधित समस्याओं पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान युग की आवश्यकता है कि समाज, शिक्षा से जुड़े संसाधनों एवं व्यवस्थाओं का प्रबंधन करे तथा शिक्षा, समाज के संतुलित विकास हेतु कार्य करे। भारतीय शिक्षा के सांस्कृतिक पक्षों को अपनाकर हम भारतीय समाज को नवीन दिशा प्रदान कर सकते हैं। लैंगिक विषमता, बालश्रम, नारी अशिक्षा, जातिगत व आर्थिक भेदभाव जैसी समस्याओं का समाधान अध्यापक शिक्षा के माध्यम से करने की दिशा में कार्य करना चाहिये।

दो दिवसीय सेमीनार के दौरान प्रस्तुत पत्रों का सार प्रस्तुत करते हुए डाॅ. सरोज राय ने बताया कि शिक्षा केवल आजीविका का साधन होना, गुरू-शिष्य के मध्य स्तर असमानता, प्रजातांत्रिक एवं चारित्रिक मूल्य पतन, बढ़ती आर्थिक व सामाजिक असमानता, विशिष्ट बालकों का मुख्यधारा से विलग होना वर्तमान शैक्षिक व सामाजिक परिवेश की व्यापक समस्याएं हैं। इन सभी समस्याओं के समाधान हेतु समस्त अध्यापक शिक्षकों, समाज-सेवकों एवं प्रशासकों को सम्मिलित प्रयास करने की आवश्यकता है।

सेमीनार के सत्रों में विविध राज्यों से पधारे प्रतिभागी एवं विषय विशेषज्ञों ने शैक्षिक एवं सामाजिक समस्याओं पर विचार-मंथन किया, जिनमें प्रो. जे.पी.एन. मिश्रा, प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, प्रो. आशुतोष प्रधान, प्रो. विजयलक्ष्मी शर्मा, डाॅ. शकुन्तला शर्मा, प्रो. श्रीधर वशिष्ठ, प्रो. दामोदर शास्त्री, श्री विनोद कुमार कक्कड़, कानपुर से डाॅ. शिवनारायण, गुड़गांव से डाॅ. युधिष्ठिर, उत्तराखण्ड से एन.बी. सिंह, डाॅ. दोबाकी सिरोला, फरीदाबाद से वरुण शर्मा, विलासपुर से डाॅ. अनिता रानी, डाॅ. शिवदयाल, रविन्द्र मारू, मौसम पारीक, विनोद जैन, उर्मिला शर्मा, डाॅ. सुरभि शर्मा आदि प्रमुख रहे। विभागाध्यक्ष प्रो. बी.एल. जैन ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का आभार ज्ञापित किया।

संगोष्ठी के समापन समारोह का शुभारम्भ बी.एड. छात्राध्यापिकाओं द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुति के साथ हुआ। मंचस्थ अतिथितियों का परिचय संगोष्ठी के समन्वयक डाॅ. बी. प्रधान ने दिया। स्वागत की परम्परा का निर्वहन करते हुए डाॅ. मनीष भटनागर एवं डाॅ. गिरधारीलाल शर्मा ने संस्थान के कुलपति महोदय एवं मुख्य अतिथि का स्वागत किया। संगोष्ठी में कुल 125 प्रतिभागियों ने पत्र वाचन किया। कार्यक्रम का संचालन वत्सला शर्मा ने किया।

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