जैन न्याय विषयक दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित

अनेकान्त में सभी दर्शनों का समन्वय: प्रो. दूगड़

लाडनूँ, 11 नवम्बर, 2016। जैन विश्वभारती संस्थान के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग द्वारा ‘‘शास्त्रवार्तासमुच्चय’’ नामक दार्शनिक ग्रन्थ पर आयोजित एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (दिनांक 11 नवम्बर से 20 नवम्बर, 2016) का उद्घाटन संस्थान के कुलपति प्रो. बी.आर. दूगड़ की अध्यक्षता में हुआ। कुलपति प्रो. बी.आर. दूगड़ ने कार्यशाला की सफलता की कामना करते हुए कहा कि विभिन्न भारतीय दर्शनों का समन्वय यदि कहीं है तो वह केवल अनेकान्त दर्शन में ही सम्भव है। उन्होंने कहा कि दार्शनिक समन्वय का उल्लेख करते हुए जैनाचार्यों के योगदान की सराहना की तथा जैन दर्शन के सर्वमान्य सिद्धान्त अनेकान्त दृष्टि में सभी दार्शनिक परम्पराओं के समन्वय का उल्लेख किया। विश्व के सभी दर्शनों का मूल लक्ष्य पूर्ण सुख की प्राप्ति करना रहा है तथा जिस प्रकार विश्व की समस्त नदियाँ विभिन्न रास्तों से बहती हुई अंत में सागर में ही मिलती हैं, उसी प्रकार विविध मत अनेकान्त सिद्धान्त में समाविष्ट हो जाते हैं।

कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि प्रो. दामोदर शास्त्री ने कार्यशाला के प्रतिपाद्य विषय का परिचय ऐतिहासिक दृष्टि से दिया तथा श्रमण एवं वैदिक परम्परा का तुलनात्मक परिचय दिया। प्रो. समणी ऋजु प्रज्ञा ने सम्पूर्ण दार्शनिक धाराओं का उल्लेख करते हुए श्रमण परम्परा का इतिहास बताया तथा आगम् एवं दर्शन में जैन न्याय परम्परा के योगदान पर भी प्रकाश डाला। प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में जैन दृष्टि की समतामूलक एवं समन्वयमूलक प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला। उन्होंने आचार्य हरिभद्र को दर्शन के क्षेत्र में सबसे बड़े समन्वयवादी विचारक बताया। कार्यशाला में सम्मिलित विभिन्न प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष समणी चैतन्य प्रज्ञा ने कार्यशाला के पीछे भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के प्रमुख उद्देश्य पर प्रकाश डाला और कहा कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान के आधार विभिन्न परम्पराओं में उपलब्ध धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ है। उनका अध्ययन और अध्यापन न केवल प्राचीन ज्ञान और विज्ञान को जानने के लिए आवश्यक है अपितु जीवन और जगत् से जुड़ी हुई मूलभूत समस्याओं के समाधान में भी सहायक है। यही कारण है कि भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली वर्तमान पीढ़ी में इन ग्रंथों के अध्ययन और अध्यापन की रुची पैदा हो, इसके लिए इस प्रकार की कार्यशालाओं का आयोजन अनेक विश्वविद्यालयों में कर रही है। आचार्य हरिभद्र द्वारा रचित जैन न्याय विषयक ग्रंथ ‘‘शास्त्रवार्तासमुच्चय’’ है। इस ग्रन्थ में आत्मा, तत्त्व, पुण्य-पाप, काल, स्वभाव, ईश्वर, विज्ञानवाद, शून्यवाद, ब्रह्मवाद एवं मोक्ष आदि से जुड़े हुए प्रश्नों पर तुलनात्मक और समन्वय की दृष्टि से विचार किया गया है, जिस पर विभिन्न विद्वानों के द्वारा 10 दिवसों में चर्चा-परिचर्चा की जायेगी। कार्यक्रम का संयोजन विभाग के सहायक आचार्य डाॅ. योगेश कुमार जैन ने किया। ज्ञातव्य है कि इस कार्यशाला में राजस्थान, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, झारखण्ड एवं मध्यप्रदेश से लगभग 35 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं।

20 नवम्बर, 2016। कार्यक्रम के समापन समारोह की अध्यक्षता संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने की। समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. वीरसागर जैन, लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली और विशिष्ट अतिथि प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, जयपुर थे। समारोह में अतिथियों का स्वागत एवं कार्यशाला प्रतिवेदन प्रस्तुति विभाग की अध्यक्षा प्रो. समणी चैतन्य प्रज्ञा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संयोजन विभाग के सहायक आचार्य डाॅ. योगेश कुमार जैन ने किया।

कार्यशाला के समापन सत्र में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि वैश्विक चिन्तन दो दिशाओं में प्रवाहित होता रहा है-श्रेय और प्रेय। श्रेयोन्मुखी विचारधाराओं में जीवन और जगत से जुड़े हुए शाश्वत प्रश्नों पर विचार किया गया है। जैनदर्शन, बौद्धदर्शन और वैदिकदर्शन श्रेयोन्मुखी विचारधारा के अंग हैं। प्रेयोन्मुखी विचारधारा में भौतिक सुख और समृद्धि जीवन का लक्ष्य माना गया है और उसकी प्राप्ति के लिए किसी भी साधन को अपनाना अनुचित नहीं माना गया है। चार्वाक दर्शन और पाश्चात्य संस्कृति प्रेयोन्मुखी विचारधारा के अंग हैं।

प्रो. वीरसागर जैन ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि आज भारत की अस्मिता का पुनरुद्धार करने के अनेक तरीके हैं उसमें भारतीय मनीषियों के द्वारा लिखित उदारवादी और सत्यशोधपरक दार्शनिक ग्रंथों पर आयोजित होने वाली इस प्रकार की कार्यशालाएँ मुख्य भूमिका निभा सकती हैं।

भारत की आध्यात्मिक एवं समन्वयवादी संस्कृति का कारण शास्त्रवार्तासमुच्चय जैसे दार्शनिक ग्रंथों के अध्ययन और अध्यापन की सुदीर्घ परम्परा रही है। भारत वह भूमि है जहाँ किसी समय लकड़हारा भी व्याकरणशास्त्र का जानकार होता था। जहाँ भोज जैसे राजा ने आदेश निकाला था कि यदि कोई चाण्डल भी हो किन्तु यदि वह ज्ञानानुरागी है तो वह मेरे देश में रह सकता है। तब जातिवाद नहीं बल्कि स्याद्वाद ही मुख्य रहे थे। ऐसे विषयों के चिन्तन-मनन से देश की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाओं हेतु मेरा सदा योगदान रहा है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. श्रेयांस कुमार जैन ने कहा कि यदि जैन विश्वभारती संस्थान जैसी 50-100 संस्थान भी हो जाएँ तो वर्तमान की अनेक समस्याओं का समाधान हो जायेगा। दर्शनशास्त्र सत्य का ज्ञान है। अच्छा विचारक बनने के लिए ऐसे ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन आवश्यक है। दर्शनशास्त्र में कल्पना, अंधविश्वास नहीं अपितु तात्विक ज्ञान दिया जाता है और विवेक-चेतना को जागृत करने पर बल दिया जाता है। कल्पना का सहारा लिया जा सकता है किन्तु उसका उद्देश्य सत्य को जानना होना चाहिए। दस दिवसीय कार्यशाला के सफल आयोजन पर विभाग की अध्यक्षा और प्राध्यापकों को धन्यवाद देते हुए उन्होंने जैन विद्या के व्यापक एवं सामाजिक अध्ययन हेतु कार्यशाला में समागत विद्वानों को नये अल्पकालिक पाठ्यक्रमों के निर्माण के लिए आह्वान किया। समागत शोधार्थियों को जैन विद्या के गहन अध्ययन हेतु सम्पूर्ण सुविधा तथा उन्हें भविष्य में रोजगार प्रदान करने का आश्वासन दिया।

संस्थान के कुलसचिव प्रो. विनोद कुमार कक्कड़ ने आगन्तुक विद्वानों और प्रतिभागियों को धन्यवाद देते हुए उन्हें संस्थान से जुड़े रहे के लिए कहा। कार्यशाला में मध्यप्रदेश, बिहार, प. बंगाल, गुजरात, उत्तरप्रदेश और राजस्थान से 35 शोधार्थियों और शिक्षकों ने भाग लिया। समापन कार्यक्रम मे संस्थान के सभी विभागों के विभागाध्यक्ष, संकाय सदस्य, शोधार्थी, समणीवृंद एवं मुमुक्षुवर्ग उपस्थित रहे। कार्यशाला की निदेशिका विभाग की अध्यक्षा प्रो. समणी चैतन्य प्रज्ञा एवं समन्वय डाॅ. योगेश जैन थे।

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