भारतीय संस्कृति के संवाहक प्राकृत भाषा एवं साहित्य - प्रो. दूगड़

लाडनूं 21 नवम्बर, 2016। संस्कृत एवं प्राकृत दोनों ही भाषाएँ भारतीय संस्कृति को प्रकट करने वाली हैं। इन दोनों ही भाषाओं का अपना-अपना महत्त्व है। प्राकृत सुकुमार भाषा है। अतः इसको केवल शास्त्राध्ययन तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिये अपितु इसको जन सामान्य तक पहुंचाने के लिए विशेष प्रयत्न किये जाने चाहिए। उपरोक्त विचार जैन विश्वभारती संस्थान के प्राच्यविद्या एवं भाषा विभाग एवं राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली द्वारा आयोजित प्राकृत साहित्य की विभिन्न विधाएँ एवं भाषात्मक वैशिष्ट्य विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने प्रकट किये। उन्होंने प्राकृत के महत्व पर प्रकाश डालते हुये कहा कि प्राकृत इस भाषा के साहित्य में निहित तत्त्वों को छोटे-छोटे विषयों के माध्यम से शोधार्थियों को शोध करना चाहिये। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. सुषमा सिंघवी ने प्राकृत के सैद्धान्तिक पक्ष को प्रकट करते हुये उनकी सरलता एवं भावगम्यता पर बल दिया। उन्होंने वर्तमान समय में प्राकृत की उपयोगिता पर भी बल दिया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डाॅ. रविन्द्रकुमार वशिष्ट ने प्राकृत साहित्य में निहित वैज्ञानिक तथ्यों को उजागर करते हुये वर्तमान समय में हो रहे अनुसंधानों एवं तकनिकी विशेषताओं के लिए भी प्राकृत साहित्य को बहुत ही उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण विषय माना। प्रो. दामोदर शास्त्री ने प्राकृत की सरलता को प्रतिपादित संस्कृत और प्राकृत की तुलना की तथा उसमें प्राकृत की विशेषताओं को प्रतिपादित किया।

अतिथियों का स्वागत एवं संगोष्ठी के उद्देश्यों को प्रतिपादित करते हुये विभाग की विभागाध्यक्ष डाॅ. समणी संगीत प्रज्ञा ने प्राकृत भाषा को अतिप्राचीन बताते हुये अशोक एवं खारवेल के अभिलेखों का उल्लेख किया एवं अनेक उद्धरणों के माध्यम से प्राकृत के महत्त्व को प्रतिपादित किया।

इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग 30 विद्वान् भाग ले रहे हैं। उद्घाटन सत्र में संस्थान के कुलसचिव विनोद कुमार कक्कड़, प्रो. अनिल धर, दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के निदेशक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, वित्ताधिकारी राकेश कुमार जैन सहित संस्थान के गणमान्य प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ संस्थान-गीत से हुआ। मुमुक्षु बहनों ने मंगलाचरण किया। अतिथि विद्वानों का शाॅल साहित्य एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया।

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