जैन तेरापंथ आचार्यों व साधु-संतों ने 1760 से लगातार राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया- प्रो. अर्जुनदेव चारण,
लाडनूँ, 10 अक्टूबर 2026। जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के राजस्थानी भाषा अर साहित्य विभाग के तत्वावधान में ‘तेरापंथ अर राजस्थानी साहित्य’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की अध्यक्षता में किया गया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो. अर्जुन देव चारण थे तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थानी साहित्य अकादमी बीकानेर के पूर्व अध्यक्ष डॉ. श्याम महर्षि, एवं डाॅ. सुषमा सिंघवी रहे। इन अतिथियों के साथ राजस्थानी के विद्धान राजस्थानी भाषा एवं साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास मंचस्थ रहे। संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय साहित्य अकादमी में परामर्श मंडल संयोजक डॉ. अर्जुन देव चारण ने अपने सम्बोधन में बताया कि तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक आचार्य भिक्षु के समय से ही 1760 में उन्होंने राजस्थानी में ही लिखना शुरू किया था। जैन परम्परा राजस्थानी भाषा की एक मजबूत परम्परा के रूप में रही है। यह राजस्थानी भाषा को उन्नत व समृद्ध बनाने वाली परम्परा है। आचार्य भिक्षु और जयाचार्य के अलावा भी सभी आचार्यों एवं साधुओं वगैरह ने राजस्थानी भाषा की समृद्धि के लिए बहुत काम किया है। उन्होंने तेरापंथ की ‘बखाण’ की एक परम्परा को महत्वपूर्ण बताया तथा कहा कि इसमें केवल आध्यात्मिक गुणों का ही बखाण होता है, किसी व्यक्ति विशेष का नहीं। उन्होंने बताया कि सह वीरत्व के गुणगान की परम्परा है। ख्याण का अर्थ चक्षु, या सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करना है। यह सूक्ष्मावलोकन है। तेरापंथ भारतीय ज्ञान परम्परा से आदि से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि आचार्य तुलसी कहते थे, ‘आख्या’ सुनाऊं। यह ‘आख्या’ शब्द राजस्थानी से सीधा जुड़ा हुआ शब्द है। यह प्रतिभा और परम्परा का उपयोग करने के सम्बंध में सुनाना है। उन्होंने जैन परम्परा के आधार सूत्र ‘णमोकार मंत्र’ को अद्भुत बताया और कहा कि यह नमस्कार मंत्र में किसी व्यक्ति को महत्व नहीं देता, बल्कि इसमें गुण को महत्व दिया गया है। णमोकार सूत्र किसी व्यक्ति का नाम नहीं लेता। सभी अरिहंतों को नमस्कार यानि जिसके शत्रु नष्ट हो जाए। ये शत्रु कोई बाहरी नहीं, बल्कि काम क्रोध माया मोह लोभ हैं, जो अंदर मौजूद हैं। इस प्रकार की दृष्टि इस मंत्र में छिपी है। प्रो. चारण का मानना है कि जैन परम्परा ऋषभ देव से शुरू है, जो शिव से मिली हुई परम्परा है। जैन परम्परा में जो 84 धाराएं निकली। तेरापंथ भी उनमें से ही है।
200 सालों में जैन गुरूओं व शिष्यों ने बहुत रचा राजस्थानी साहित्य
समारोह के विशिष्ट अतिथि राजस्थानी भाषा अर साहित्य अकादमी बीकानेर के पूर्व अध्यक्ष श्याम महर्षि ने कहा कि पिछले 200 वर्षों में जैन गुरुओं और उनके शिष्यों ने अपना बहुत सारा साहित्य राजस्थानी में रचा। महर्षि ने नाम गिनाते हुए बताया कि आचार्य भिक्षु, जयाचार्य, आचार्य तुलसी, मुनि कर्मचंद, मुनि दुलहचंद आदि साधुओं और साध्वियों ने भी राजस्थानी में बहुत महत्वपूर्ण रचनाएं लिखीं। राजस्थानी में संत साहित्य में भी बहुत सारे नाम और उनकी रचनाएं हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि जैन परम्परा महावीर स्वामी से नहीं यह बहुत पुरानी है। रामायण में भी इसका उल्लेख है। जैन परम्परा में अलग-अलग सम्प्रदाय बनते रहे। सनातन में 250 करीब परम्पराएं हैं। फिर भी सभी सनातनी हैं। इसी प्रकार जैन परम्परा में भी सभी पहले जैनी हैं, सम्प्रदाय बाद की बात है। तेरापंथ में कर्मवाद को मान्यता दी। गीता में भी कर्म की बात है यही बात भिक्षु ने अपनी बात में कही है। तेरापंथ में एक ही गुरु होने के नेतृत्व व अनुशासन को निर्धारित किया था। अनुशासन के कारण ही विशाल साध्वी समुदाय तेरापंथ में हैं।
राजस्थानी को आधुनिकता से जोड़ना और रोजगार परक बनाना जरूरी
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि राजस्थानी सिर्फ एक भाषा नहीं, यह शौर्य, त्याग और प्रेम की संस्कृति है। राजस्थानी का साहित्य सौंदर्य और विविधता पूर्ण है। राजस्थानी काव्य की रचना तलवारों और युद्धों के बीच में भी हुई है। राजस्थानी में भक्तिपरक साहित्य पर भी बहुत रचनाएं हुई हैं। तेरापंथ के आचार्य जयाचार्य की बनाई ‘ढाल’ आज भी लोगों के लिए संकट मोचक बनी हुई है। उससे तत्समय भी संकट टला था और अब भी बाधाएं टलती हैं। प्रो. दूगड़ ने बताया कि उन्होंने बताया कि राजस्थानी में तेरापंथ का साहित्य विशद है, लेकिन लोग अभी इससे अनभिज्ञ हैं। तेरापंथ में राजस्थानी साहित्य के क्षेत्र में बहुत सारा काम किया गया था। उन्होंने बताया कि लोकदेवताओं और लोक रचनाओं से राजस्थान की लोक-परम्पराएं जीवित होती हंै। राजस्थानी साहित्य हमें परम्परा से ही मिलता आया था, लेकिन बीच का काल राजस्थानी के लिए सुप्तकाल रहा था। अब फिर लोगों में मातृभाषा को लेकर जागृति आई है। विश्वविद्यालयों और शिक्षा में राजस्थानी का प्रभाव बढा है। इसके आधार पर रोजगार होना भी जरूरी है। आधुनिक विधाओं में भी राजस्थानी को जोड़ा जाना जरूरी है। विज्ञान और तकनीक के साथ आलोचना में और सोशल मीडिया, लाईब्रेरी में भी राजस्थानी का समावेश जरूरी है। उन्होंने जैन विश्वभारती संस्थान के माध्यम से राजस्थानी की सेवा करने के लिए संगोष्ठी में पधारे सभी राजस्थानी साहित्यकारों के लगातार सहयोग की आवश्यकता बताई।
राजस्थानी के विकास में रहा तेरापंथ का योगदान
संगोष्ठी में डाॅ. देव कोठारी ने ओनलाइन वक्तव्य प्रस्तुत कर राजस्थानी भाषा का महत्व बताया और तेरापंथ धर्मसंघ के राजस्थानी के विकास में दिए गए योगदान को बताया। डॉ. सुषमा सिंघवी ने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का प्रथम पत्र वाचन करते हुए तेरापंथ साहित्य में अपरिग्रह पर आचार्य भीखणजी और जयाचार्य जी के योगदान को समझाया और उनके राजस्थानी साहित्य में विचारधारा सम्बंधी अवदान की जानकारी दी। प्रारम्भ में विश्वविद्यालय के राजस्थानी भाषा और साहित्य केे विभागाध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत व्यास ने संगोष्ठी की विषयवस्तु के बारे में जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय में राजस्थानी विभाग की स्थापना का इतिहास बताया और वर्तमान में बीए, एमए में अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों तथा 12 शोधार्थियों व जेआरएफ ले रहे शोध-छात्रों की जानकारी दी। उन्होंने संगोष्ठी के सभी अतिथियों का परिचय प्रस्तुत करते हुए स्वागत किया। उन्होंने बताया कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य तेरापंथ और राजस्थानी साहित्य की ओलखाण करवाना है। 300 साल पहले तेरापंथ की स्थापना हुई। पहले आचार्य भिक्षु ने राजस्थानी में ही साहित्य की रचना की। कार्यक्रम छा़ाओं के मंगल गान से प्रारम्भ हुआ। अतिथियों का स्वागत प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन, प्रो. बीएल जैन, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास, डॉ. वंदना कुंडलिया आदि द्वारा किया गया। अंत में आभार ज्ञापन सहायक आचार्य डॉ. जियाराम ने किया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में राजस्थानी साहित्यकार मदन सैनी, सुरेश सालवी, गौरीशंकर प्रजापत, पूनम आचार्य आदि के साथ राजस्थानी भाषा विभाग के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।




