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आत्मबल के बिना अहिंसा को नहीं अपनाया जा सकता- अजय असवाल (निदेशक, शांति एवं अहिंसा विभाग राजस्थान सरकार)
01 Oct 2026
आत्मबल के बिना अहिंसा को नहीं अपनाया जा सकता- अजय असवाल (निदेशक, शांति एवं अहिंसा विभाग राजस्थान सरकार)
लाडनूं के जैविभा विश्वविद्यालय में राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में मनाया अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस लाडनूँ, 1 अक्टूबर 2026। राजस्थान सरकार के शांति एवं अहिंसा विभाग एवं जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस एवं गांधी जयंती के उपलक्ष में गुरूवार को यहां विश्वविद्यालय स्थित आॅडिटोरियम में ‘अहिंसाः नई सोच, नया समाज’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में राज्य सरकार के शांति एवं अहिंसा विभाग के निदेशक अजय असवाल ने कहा कि भारतीय परम्परा में शांति और अहिंसा को शुरू से ही पूरा महत्व दिया जाता रहा है। यहां महावीर एवं बुद्ध ने अहिंसा का संदेश दिया था। महाव्रतों के रूप में लागू की गई यह अंिहंसा बाद में सबके लिए लागू करने के लिए अणुव्रतों में भी परिवर्तित की गई। बौद्ध एवं हिंदू धर्मों में आत्मा का स्वाभाविक धर्म ही अहिंसा को माना गया है। महात्मा गांधी द्वारा प्रचलित अहिंसा को मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला आदि सभी ने अपनाया। अहिंसा को विश्व के अनेक देशों में फैलाया गया। दुनिया में भारत को आज भी महात्मा गांधी का देश कहा जाता है। उन्होंने इस अवसर पर प्रशासन द्वारा अपनाए जा सकने वाले अहिंसा के छोटे-छोटे प्रयोग भी समझाए। साथ ही उन्होंने कहा कि अहिंसा को अपनाने के लिए व्यक्ति में प्रचुर आत्मबल होना आवश्यक है। असवाल ने सोशल मीडिया पर भी अहिंसा का उपयोग करने एवं एआई केे नवाचारों में भी अहिंसा के महत्व को समझाया। शांति एवं अहिंसा होती है प्रगतिशीलता में सहायक राजस्थान प्रशासनिक सेवा की अधिकारी एवं शांति एवं अहिंसा निदेशालय की उपनिदेशक श्रीमती मधु रघुवंशी ने संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए कहा कि मनुष्य शांति एवं अहिंसा के विचारों से ही प्रगतिशील बन सकता है। उन्होंने शांति एवं अहिंसा निदेशालय की स्थापना, उद्देश्य, कार्यक्रमों आदि की जानकारी दी और कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसा एवं शांति के विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। अहिंसा एवं शांति के विचारों से ही राष्ट्र का निर्माण संभव है। विश्वविद्यालय के अहिंसा एवं शांति विभाग की विभागाध्यक्ष वंदना कुंडलिया ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय अहिंसा को जीवन में उतारने की प्रयोगशाला है। पिछले तीन दशकों से यहां शांति एवं अहिंसा को जीवन में उतारने के लिए अनवरत कार्य किया जा रहा है। अहिंसा प्रशिक्षण के माध्यम से समाज में इसके लिए नई संभावनाएं तलाशी जा रही है। उन्होंने अहिंसा के विचार को व्यवहार में बदलने और व्यवहार को संस्कार में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने प्रशासन, समाज ओर शिक्षा में तालमेल द्वारा अहिंसा की सोच को नये समाज की रचना में आवश्यक बताया। सविता राठी व दुर्गादल समिति का किया गया सम्मान इस अवसर पर जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय की ओर से शांति एवं अहिंसा तथा इनसे जुड़े हुए क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले दो व्यक्तियोें को सम्मानित करने की परम्परा को शुरू किया गया। इस वर्ष यह सम्मान पर्यावरण, पंचायत राज और महिला सशक्तिकरण क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किए जाने के लिए सुजानगढ तहसील के गोपालपुरा ग्राम पंचायत की प्रशासक एवं पूर्व सरपंच सविता राठी को एवं लाडनूं में पर्यावरण एवं सामाजिक क्षेत्र में सेवाकार्यों के लिए दुर्गादल सेवा समिति को ‘प्रकृति मित्र सम्मान’ प्रदान किया गया। यह सम्मान समिति के अध्यक्ष मनीष शर्मा एडवोकेट एवं समिति के अन्य सदस्यों को प्रदान किया गया। संगोष्ठी में सविता राठी ने अपने सम्बोधन में सरपंच रहते हुए किए गए कार्यों के बारे में बताया तथा कहा कि महात्मा गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार थे। आज 167 देशों में महात्मा गांधी को पढाया जा रहा है। दुर्गादल सेवा समिति के हर्षवध्रन चारण ने भी दुर्गादल द्वारा किए गए कार्यों की जानकारी दी। अहिंसा जीवन के हर पहलु के लिए उपयोगी शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीएल जैन ने संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए अपने सम्बोधन में जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के अहिंसा एवं शांति क्षेत्र में एक पृथक व स्वतंत्र विभाग की स्थापना किए जाने, इस सम्बंध में पाठ्यक्रमों एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संचालन, पुस्तकों के प्रकाशन, विभिन्न पैटेंट प्राप्त किए जाने आदि की पूरी जानकारी दी। विश्वविद्यालय के कुलसचिव देबाशीष गोस्वामी ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि अहिंसा को केवल राजनीति के लिए प्रयोग समझना ठीक नहीं है। अहिंसा सम्पूर्ण जीवन के हर पहलु के लिए आवश्यक तत्व है। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसा के साथ गौतम बुद्ध और भगवान महावीर की अहिंसा को भी समझाया। कार्यक्रम की संचालिका डाॅ. लिपि जैन ने संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए महात्मा गांधी के जीवन पर प्रकाश डाला तथा कहा कि अहिंसा केवल राजनीति का साधन ही नहीं, यह जीवन का आध्यार भी है। कार्यक्रम का प्रारम्भ मीनल द्वारा प्रस्तुत वंदे मातरम संगान के साथ किया गया। सभी अतिथियों का स्वागत कुलसचिव देबाशीष गोस्वामी, प्रो. बीएल जैन, वंदना कुंडलिया, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास, डाॅ रविन्द्र सिंह राठौड़, प्रो. युवराज सिंह खंगारोत, डाॅ. लिपि जैन, दीपाराम खोजा आदि ने पुष्पगुच्छ भेंट कर, शाॅल ओढा कर एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर किया। अंत में डाॅ. बलबीर सिंह चारण ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम में सभी विभागों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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हर्षोल्लास से मनाया गया रक्षाबंधन पर्व
27 Aug 2026
लाडनूँ, 27 अगस्त 2026। जैन विश्वभारती संस्थान के शिक्षा विभाग में 27 अगस्त को रक्षाबंधन पर्व का आयोजन हर्षोल्लास एवं आत्मीय वातावरण में किया गया। कार्यक्रम के दौरान सहायक आचार्य सुश्री स्नेहा शर्मा ने रक्षाबंधन पर्व की महत्ता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने वर्तमान समय में ‘रक्षा’ के व्यापक अर्थ को रेखांकित करते हुए कहा कि एक-दूसरे के सम्मान, सपनों, आत्मविश्वास एवं अधिकारों की रक्षा करना इस पर्व का महत्वपूर्ण संदेश है। शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीएल. जैन ने रक्षाबंधन के सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे पर्व हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जोड़ने का कार्य करते हैं। कार्यक्रम में डॉ. अमिता जैन, डॉ. आभा सिंह, डॉ. मनीष भटनागर, डॉ. गिरधारी लाल शर्मा, डॉ. गिरिराज भोजक, डॉ. देवीलाल कुमावत व सभी विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन आपसी प्रेम, सौहार्द एवं भाईचारे की भावना को मजबूत करने के संकल्प के साथ हुआ।
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अहिंसा और शांति विभाग द्वारा वैकल्पिक जीवनशैली पर त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ आयोजन’
27 Aug 2026
लाडनूँ, 27 अगस्त 2026। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के अहिंसा एवं शांति विभाग द्वारा ऑनलाइन 'Alternative Lifestyle' विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला के प्रथम चरण का 26 अगस्त को सफलतापूर्वक समापन हुआ। 24 से 26 अगस्त तक आयोजित इस कार्यशाला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महासभा के प्रकल्प ‘बेटी तेरापंथ की’ के प्रकल्प में पंजीकृत बेटियों ने सहभागिता की। कार्यशाला के प्रथम दिन विभाग की सहायक आचार्य डॉ. लिपि जैन ने आधुनिक जीवनशैली एवं वैकल्पिक जीवनशैली के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए दैनिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के व्यावहारिक एवं कारगर सुझाव दिए। द्वितीय दिवस आचार्य महाप्रज्ञ नेचुरोपैथी एवं योग की सहायक आचार्य डॉ. नीलम राठौड़ ने प्राकृतिक चिकित्सा, आहार एवं खान-पान के संदर्भ में वैकल्पिक जीवनशैली की उपयोगिता एवं महत्त्व पर प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए आहार संबंधी जागरूकता एवं जीवनशैली में आवश्यक बदलावों पर प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किय। तथा जीवन विज्ञान, योग और प्रेक्षाध्यान की नंदिनी कासलीवाल ने योगिक क्रियाओं, श्वास क्रियाओं एवं सरल स्वास्थ्यवर्धक प्रयोगों के माध्यम से स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का प्रशिक्षण दिया। प्रतिभागियों ने विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करते हुए अपने प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। कार्यक्रम में प्रथम चरण में सहभागिता करने वाली सभी 30 बेटियों को जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) की ओर से सहभागिता प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।कार्यशाला के संपूर्ण संयोजन में अहिंसा एवं शांति विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. वंदना कुण्डलिया बरडिया ने कार्यशाला की संयोजन और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। विभाग के डॉ. रविंद्र सिंह राठौड़,डॉ लिपि जैन एवं डॉ. बलबीर सिंह चारण का विशेष सहयोग एवं मार्गदर्शन रहा। विभाग द्वारा आयोजित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य युवतियों को स्वस्थ, संतुलित, जागरूक एवं मूल्यपरक वैकल्पिक जीवनशैली के प्रति प्रेरित करना रहा।
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