जैन विश्वभारती संस्थान के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग में ‘‘जैन योग में आचार्य महाप्रज्ञ का योगदान’’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित

प्रेक्षाध्यान केवल शारीरिक व्याधियां ठीक करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मदर्शन का माध्यम- डाॅ. मल्लीप्रज्ञा

लाडनूँ, 13 फरवरी 2020। आचार्य महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी वर्ष के अवसरपर जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग के तत्वावधान में यहां एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। ‘‘जैन योग में आचार्य महाप्रज्ञ का योगदान’’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में समणी नियोजिका डाॅ. समणी मल्लीप्रज्ञा ने कहा कि यह तुलसी-महाप्रज्ञ युग है, जिसमें मानव-निर्माण का बीड़ा उठाया गया है। अणुव्रत-जीवन विज्ञान आधारित पद्धति से यह कार्य किया जा रहा है। ऋषभ से लेकर महावीर तक और महावीर से लेकर तुलसी-महाप्रज्ञ तक जैन योग द्वारा चेतना के ऊर्ध्वारोहण का कार्य किया गया है। उन्होंने बताया कि कायोत्सर्ग को शवासन या शिथिलीकरण ही नहीं माना जाये, बल्कि यह आत्मा और शरीर की भिन्नता को प्रकट करने का प्रयोग है। प्रेक्षाध्यान बीपी, डायबीटीज आदि शारीरिक व्याधियों को ठीक करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आत्मदर्शन का माध्यम है। यह चेतना की धारा को वीतरागतातक ले जाता है। महाप्रज्ञ का विश्व को सबसे बड़ा अवदान है चेतना का रूपांतरण और यही प्रेक्षाध्यान का वैशिष्ट्य है। महावीर का योगदान था उपदान और निमित की चेतना। कर्म सारे निमित होते हैं। हम किसी को न सुधार सकते हैं और प बिगाड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि प्रेक्षाध्यान शुद्ध अध्यात्म का विज्ञान है। वैज्ञानिक तौर पर हम इसे सिद्ध कर सकते हैं। उपादान हमारी आत्मा है। यह आत्मा पर चोट करता है। प्रेक्षाध्यान आत्मा का स्वास्थ्य सुधारता है। कार्यशाला में प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम आयोजित किया जाकर जिज्ञासाओं के समाधान भी समणी डाॅ. मल्लीप्रज्ञा द्वारा किया गया।

महावीर से महाप्रज्ञ तक जैन योग का सफर

कार्यशाला की अध्यक्ष प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने इस अवसर पर कहा कि महाप्रज्ञ ने 20वीं शताब्दी में प्रेक्षाध्यान दिया, लेकिन इससे पूर्व जैन योग की स्थिति क्या रही, इस पर विचार किया जाने पर ज्ञात होता है कि भगवान महावीर की साधना कायोत्सर्ग, भावना, विपश्यना और विचय- इन चार में विभक्त थी। इसे महाप्रज्ञ ने अपनी पुस्तक ‘महावीर की साधना का रहस्य’ में विस्तार से समझाया है। महावीर के बाद के समय में ध्यान की परम्परा लुप्त हो गई थी। बाद में ध्यान प्रधान जैन धर्म के स्थान पर स्वाध्याय प्रधान धर्म रह गया था। फिर हठयोग और तंत्र ने स्थान बनाया। आचार्य महाप्रज्ञ ने प्रेक्षाध्यान प्रदान करके जैन योग को नई दिशा प्रदान की। प्रो. ऋजुप्रज्ञा ने आत्मा के आठ प्रकार बताते हुये कहा कि जो शुद्ध आत्मा होती है, वही योग आत्मा, कषाय आत्मा, वीर्य आत्मा, उपयोग आत्मा, ज्ञान दर्शन आत्मा, क्रोध आत्मा आदि रूप धारण करती है। महावीर ने स्वयं सत्य को खोजने का संदेश दिया है। उन्होंने बताया कि ध्यान को ज्ञान का विषय नहीं बल्कि अभ्यास का विषय मानना चाहिये। मन को चंचलता से बाहर निकालना जरूरी है। कार्यशाला के मुख्य अतिथि राजेन्द्र मोदी इंदौर ने आचार्य महाप्रज्ञ को महायोगी बताया तथा उनकी सिद्धि के अनेक अनुभव साझा किये। विशिष्ट अतिथि पारस दूगड़ मुम्बई ने जीवन की जटिल समस्याओं से छुटकारा पाने का साधन प्रेक्षाध्यान को बताया तथा कहा कि इससे जीवन को परिवर्तित करने की क्षमता है। प्रेक्षाध्यान से शारीरिक, मानसिक व भावात्मक परिवर्तन लाये जा सकते हैं। मिश्रीमल जैन ने बताया कि उसकी अस्थमा की बीमारी प्रेक्षाध्यान से ठीक हो गई। वह पिछले 40 सालों से प्रेक्षाध्यान का अभ्यास कर रहा है। इसमें जीवन में बदलाव लाने की शक्ति है। अंत में डाॅ. प्रद्युम्न सिंह शेखावत ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डाॅ. योगेश कुमार जैन ने किया।

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