लाडनूँ, 9 सितम्बर 2026। पर्युषण पर्व के द्वितीय दिवस ‘स्वाध्याय दिवस’ के अवसर पर जैन विश्वभारती संस्थान के शिक्षा विभाग में संकाय सदस्यों के मध्य एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया। सत्र में सभी संकाय सदस्यों ने अपने अनुभवों एवं विचारों के माध्यम से स्वाध्याय के महत्व एवं जीवन में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। सत्र का प्रारंभ विभागाध्यक्ष प्रो. बी.एल. जैन के वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय का अर्थ आत्मचिंतन, आत्मसमीक्षा एवं आत्मविश्लेषण करना है। प्रतिदिन अपने कार्यों की समीक्षा करने तथा श्रेष्ठ साहित्य के अध्ययन से मन निर्मल होता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि जीवन की कठिन परिस्थितियों से निकलने में भी स्वाध्याय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डॉ. अमिता जैन ने स्वाध्याय के साथ विवेक चेतना के जागरण को आवश्यक बताते हुए कहा कि अच्छी बातों को ग्रहण करना, त्याज्य को छोड़ना तथा उपेक्षणीय के प्रति तटस्थ रहना ही विवेक चेतना है। डॉ. गिरिराज भोजक ने स्वाध्याय के लिए अभिरुचि, एकाग्रता एवं आवश्यकता को तीन प्रमुख तत्व बताते हुए विद्यार्थियों में स्वाध्याय की रुचि विकसित करने को शिक्षकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बताया। डॉ. मनीष भटनागर ने कहा कि स्वाध्याय तभी सार्थक है जब उसे पूर्ण एकाग्रता एवं मनोयोग से किया जाए। केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि विषय को समझना और उसे जीवन से जोड़ना आवश्यक है। डॉ. आभा सिंह ने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए पुस्तकों को ज्ञान के साथ-साथ तनाव से दूर रखने एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का माध्यम बताया। उन्होंने बदलते समय के साथ साहित्य एवं लेखकों के विचारों में आए परिवर्तनों पर भी चर्चा की। सुश्री स्नेहा शर्मा ने स्वाध्याय दिवस पर प्रतिदिन 30 मिनट स्वाध्याय करने का संकल्प व्यक्त करते हुए कहा कि नियमित स्वाध्याय आत्मावलोकन का अवसर देता है, हमें आने वाले दिन के लिए बेहतर ढंग से तैयार करता है तथा मानसिक सक्रियता एवं सकारात्मक सोच बनाए रखने में सहायक है।
डॉ. अनुजा ने स्वाध्याय को आत्मनिरीक्षण से जोड़ते हुए कहा कि व्यक्ति को अपनी आयु, समय, परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए। डॉ. गिरधारी लाल शर्मा ने स्वाध्याय को चेतना शक्ति के विकास का सशक्त माध्यम बताते हुए इसे विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के जीवन का अनिवार्य अंग बनाने पर बल दिया। वहीं डॉ. विष्णु कुमार ने स्वाध्याय के माध्यम से स्वाभिमान, आत्मविश्वास एवं सकारात्मक सोच के विकास की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।



