जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) में ‘‘भारतीय संस्कृति का भविष्य’’ विषयक व्याख्यान आयोजित
विश्व के अस्तित्व की सुरक्षा भारतीय संस्कृति से ही संभव- डाॅ. गुप्ता
लाडनूँ 24, सितम्बर 2018। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) की महादेवलाल सरावगी अनेकांत शोध पीठ के तत्वावधान में आचार्य तुलसी श्रुत-संवर्द्धिनी व्याख्यानमाला के अन्तर्गत सोमवार को यहां महाप्रज्ञ-महाश्रमण आॅडिटोरियम में ‘‘भारतीय संस्कृति का भविष्य’’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। मुनिश्री जयकुमार के सान्निध्य में आयोजित इस व्याख्यान कार्यक्रम में व्याख्यानकर्ता आरएसएस के उत्तर क्षेत्र संघचालक डाॅ. बजरंगलाल गुप्ता ने कहा कि भारतीय संस्कृति से ही यह देश सुरक्षित है। विश्व के भविष्य के लिये भारत का रहना आवश्यक है और भारत के लिये भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाना होगा। भारत का प्राण तत्व इसकी संस्कृति ही है। केवल भौतिक रूप से अस्तित्व अलग है, लेकिन असली पहचान संस्कृति से ही होती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के लिये कहा कि यह पुरातन है, लेकिन नित्य नूतन भी है। यह सनातन, शाश्वत, चिरन्तन है और निरन्तर विकासमान, नैतिक मूल्यों का प्रवाह है। यहां हर युग में मनीषी व आचार्य होते आये हैं और इसे सदैव नवीनता प्रदान करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज की मुख्य समस्या है कि संवेदना लुप्त होती जा रही है। इस पर ध्यान देना आवश्यक है। डाॅ. गुप्ता ने कहा कि भारतीय संस्कृति प्रकृति को मातृत्व व देवत्व के रूप में लिया जाता है, जबकि पश्चिमी संस्कृति में प्रकृति को दासी स्वरूप में लेकर उसका उपयोग करते हैं। हम प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि दोहन करते हैं, लेकिन इसमें देने व लेने का क्रम नहीं टूटने देते। यहां गीता के अनुुसार सृष्टि चक्र, यज्ञ चक्र व प्रकृति चक्र की अवधारणा का पालन किया जाता है। उन्होंने भारत के जैविक परिवार, सर्वमंगलकारी चिंतन, विविधता में एकता, धर्म व नैतिकता आदि के बारे में विस्तार से बताते हुये भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
देश को बदलने के लिये नौजवान आगे आयें-सांसद मदनलाल सैनी
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सांसद मदनलाल सैनी ने इस अवसर पर कहा कि भारतीय संस्कृति अनेक विशेषताओं वाली संस्कृति है। यहां सामाजिक दायित्वों के बारे में व्यक्ति जिम्मेदार होता है और उस व्यक्ति के लिये समाज खड़ा हो जाता है। केवल अपनी ही सोचने वालों के बारे में समाज भी नहीं सोचा करता है। मंदिर में झुकने पर उस व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि आज देश को तोड़ने वाली शक्तियां सक्रिय है। आतंकवाद को पैसा और पनाह देने वालों से सावधान रहने की आवश्यकता है। उन्होंने नौजवानों से आह्वान किया कि वे ही इस देश को बदल सकते हैं। उन्होंने शिक्षा को डिग्री के लिये नहीं बल्कि देश की सेवा की शिक्षा भी जरूरी बताई। सैनी ने गाय के विनाश पर भी चिंता जताई तथा कहा किजैन समाज ने गाय की रक्षा का संकल्प लिया है और बहुत बड़ा काम हाथ में लिया है जो सराहनीय है। उन्होंने आचार्य तुलसी प्रणीत अणुव्रतों का उल्लेख करते हुये कहा कि उनके द्वारा दिखाई गई दिशा को अगर थोड़ा सा भी ग्रहण किया जावे तो जीवन में बदलाव लाया जा सकता है।
भारतीय संस्कृति पुरातन है, पर सनातन है
व्याख्यानमाला को सान्निध्य प्रदान करते हुये मुनिश्री जयकुमार ने कहा कि हमारी संस्कृति अतीत, वर्तामान व अनागत तीनों को समाहित रखती है। यह संस्कृति कभी समाप्त नहीं हो सकती। इसमें परिवर्तन, परिवर्द्धन व परिशोधन की संभावना हमेशा रहती है। जहां अनाग्रह पूर्वक परिवर्तन की प्रक्रिया चलती है, उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता है। भारत में चाहे कोई युग रहा हो, यहां के संस्कार कभी समाप्त नहीं हो पाये हैं। उन्होंने कहा कि यह संस्कृति पुरातन है, लेकिन सनातन है। हमारी संस्कृति मिलन की, साथ बैठने की, साथ चिंतन करने की और साथ में निर्णय लेने की संस्कृति है।
जहां कर्मवाद और पुरूषार्थवाद हो वहां निराशा नहीं आती
संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि भारतीय संस्कृति का आधार धर्म है। धर्म शाश्वत है इसलिये भारतीय संस्कृति भी शाश्वत है। इस संस्कृति में सुव्यवस्था है। चाहे आश्रमवाद हो, कर्मवाद व पुनर्जन्मवाद हो, यह व्यवस्था निरन्तर संस्कृति को पोषण देती है और विकसित करती है। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति आशावाद से ओतप्रोत है। इसमें जो कर्मवाद और पुरूषार्थवाद की धारा बहती है, उससे निराशावाद कभी नहीं आ सकता है। हम दूसरों को आत्मसात करने की परम्परा रखते हैं, हम दूसरों के विकास में बाधक नहीं बनते हैं। हम हर परिवर्तन को समावेश करके आगे बढ रहे हैं। हम प्रेय के बजाये श्रेय को महत्व देते हैं। त्याग, धैर्य और संतुलन जिस संस्कृति में समाविष्ट हो, वह संस्कृति कभी काल-कवलित नहीं हो सकती है। प्रारम्भ में दूरस्थ शिक्षा निदेशक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने व्याख्यानमाला की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में जैन विश्वभारती के मुख्य ट्रस्टी भागचंद बरड़िया व जीवनमल मालू विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचस्थ थे। इस अवसर पर प्रभारी डाॅ. योगेश कुमार जैन, रजिस्ट्रार विनोद कुमार कक्कड़, उपकुलसचिव डाॅ. प्रद्युम्न सिंह शेखावत, शोध निदेशक प्रो. अनिल धर, प्रो. दामोदर शास्त्री, प्रो. बीएल जैन, डाॅ. जुगल किशोर दाधीच, डाॅ. गोविन्द सारस्वत, डाॅ. बिजेन्द्र प्रधान, हरीश शर्मा, अशोक सुराणा, सागरमल नाहटा आदि उपस्थित थे।
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