21 दिवसीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिपिविज्ञान विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

पाण्डुलिपि संरक्षण से धरोहर, संस्कृति एवं इतिहास सुरक्षित - प्रो. दूगड़

लाडनूँ, 25 नवम्बर, 2017। जैन विश्वभारती संस्थान के जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग व प्राच्य विद्या एवं भाषा विभाग के तत्त्वावधान में 21 दिवसीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिपिविज्ञान विषयक कार्यशाला का शुभारम्भ संस्थान के आचार्य तुलसी-महाप्रज्ञ आॅडिटोरियम में समारोह पूर्वक हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए जैन विश्वभारती संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि पाण्डुलिपि संरक्षण धरोहर, संस्कृति व इतिहास को सुरक्षित रखने का विशिष्ट कार्य है। इससे ज्ञान के नये-नये क्षितिज उद्भव कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत विश्व का अग्रणी देश है, जहाँ प्राचीन ज्ञान का संरक्षण पाण्डुलिपि एवं लिपियों के माध्यम से किया गया है। प्रो. दूगड़ ने बताया कि भारत में 3 मिलियन पाण्डुलिपियों को संरक्षित किया गया है, जो विश्व के अन्य किसी देश में नहीं है। ज्ञान के विस्तार की मीमांसा करते हुए उन्होंने सिद्धान्त, शास्त्र एवं व्यवहार को लिपि विकास का प्रमुख आधार बताया। इस अवसर पर प्रो. दूगड़ ने पाण्डुलिपि, लिपि संरक्षण एवं ज्ञान के विकास के विविध माध्यमों पर प्रकाश डाला।

समारोह में प्रो. दूगड़ ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली के नेशनल मिशन फाॅर मैनुस्क्रीप्ट्स द्वारा पाण्डुलिपि संरक्षण एवं प्रशिक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। उन्होंने पाण्डुलिपि संरक्षण के प्रति जागरूकता की आवश्यकता बताते हुए कहा कि विश्वभर की करीब पांच हजार भाषाओं में से लगभग ढ़ाई हजार भाषाएँ ही सुरक्षित रह पायी हैं, यह चिंतनीय पहलू है।

मुख्य अतिथि वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा के पूर्व कुलपति प्रो. नरेश दाधीच ने कहा कि इतिहास-लेखन में पाण्डुलिपि का बहुत बड़ा योगदान होता है। मूल पाण्डुलिपि सामने आती है तो ही यथार्थ को समझा जा सकता है। गीता के मूल ग्रंथ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मूल गीता में 1400 श्लोक बताये गये हैं लेकिन अब करीब 700 श्लोक ही उपलब्ध हैं। प्रो. दाधीच ने लुप्त हो रही लिपियों एवं बोलियों को संकलित किये जाने की आवश्यकता का आह्वान करते हुए राजस्थानी भाषा के विभिन्न स्वरूपों के साथ भाषा व लिपि के परिष्कार की आवश्यकता जतायी।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि नेशनल मिशन फाॅर मैनुस्क्रीप्ट्स के कार्यक्रम अधिकारी डाॅ. श्रीधर बारीक ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा पाण्डुलिपि संरक्षण के लिए किये जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। प्रो. दामोदर शास्त्री ने पाण्डुलिपि संरक्षण के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए जैन परम्परा में पाण्डुलिपि व लिपि संरक्षण के योगदान को रेखांकित किया।

कार्यशाला की निदेशिका प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने अतिथियों का परिचय देते हुए स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने संस्थान का परिचय दिया। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ कुलगीत के साथ हुआ। मुमुक्षु बहिनों ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यशाला के संयोजक डाॅ. योगेश कुमार जैन ने कुशल संयोजन किया। आभार ज्ञापन प्राच्य विद्या एवं भाषा विभाग की अध्यक्ष डाॅ. समणी संगीत प्रज्ञा ने व्यक्त किया। अतिथियों का स्वागत प्रो. बी.एल. जैन, प्रो. अनिल धर, डाॅ पुष्पा मिश्रा, डाॅ अमिता जैन आदि ने किया। ज्ञात रहे इस 21 दिवसीय कार्यशाला में देश भर से करीब 40 विद्वानों ने भाग लिया।

कार्यशाला का समापन संस्थान के सेमिनार हाॅल में समारोह पूर्वक हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए जैन विश्वभारती संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि आज शिक्षा में हर जगह नवाचार का उपयोग हो रहा है, ऐसे में पाण्डुलिपि जैसे परम्परागत ज्ञान के लिए भी नवाचार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एक शोध के मुताबिक आने वाले समय में 70 प्रतिशत नौकरियों का स्वरूप एवं पदनाम बदल जायेंगे, जिसके कारण पाण्डुलिपि संरक्षण में भी नवीन तकनीक का उपयोग जरूरी है।

प्रो. दूगड़ ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश में लाखों पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं जिनमे से मात्र दस प्रतिशत पाण्डुलिपियों पर ही काम हो पाया है एवं प्रकाशन तो इससे भी कम हुआ है। जरूरत है कि पाण्डुलिपि संरक्षण एवं संपादन के प्रति विद्वत्जन नई तकनीकों का प्रयोग करते हुए अपना योगदान दें। प्रो. दूगड़ ने पाण्डुलिपि के विकास के लिए तीन बातों को महत्त्वपूर्ण बताया, जिनमें पाण्डुलिपियों का संग्रह, प्रकाशन एवं नये शोधार्थी तैयार हो। उन्होंने देश भर से आये विद्वतजनों के समक्ष सीखने की अभिप्सा को ही ज्ञान-विकास का माध्यम बताया। प्रो. दूगड़ ने बताया कि आने वाले समय में इस विश्वविद्यालय में प्राकृतिक-चिकित्सा काॅलेज एवं प्राच्य-विद्याओं की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य होगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ के प्रो. के.के. थापलियाल ने पाण्डुलिपि ज्ञान एवं गुप्तकालीन लिपियों को समझाते हुए पाण्डुलिपि मिशन को रेखांकित किया। उन्होंने पाण्डुलियों में समाहित अंकगणित, ज्योतिष विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान आदि को संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए गहनता के साथ करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर कार्यशाला की निदेशका प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए परिचय दिया। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला से पाण्डुलिपि एवं लिपियों के संरक्षण एवं ज्ञान के प्रति एक ठोस नींव का निर्माण हुआ है, जो भविष्य में और अधिक प्रवर्धमान होगा। उन्होंने कहा कि विद्वानों ने जो कुछ भी इस कार्यशाला में सीखा है, उसका अभ्यास बहुत जरूरी है। प्राकृत एवं संस्कृत भाषा विभाग की अध्यक्ष डाॅ. समणी संगीत प्रज्ञा ने 21 दिवसीय कार्यशाला का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में समणी सुयशनिधि, कुलदीप शर्मा, समणी स्वर्णप्रज्ञा आदि ने अपने अनुभव सुनाये। शुभारम्भ समणीवृन्द द्वारा प्रस्तुत मंगलसंगान से हुआ। इस अवसर पर देश भर से आये विद्वानों को प्रमाण-पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं साहित्य भेंट कर अतिथियों द्वारा स्वागत किया गया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज एवं आभार-ज्ञापन डाॅ. योगेश कुमार जैन ने किया।

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