जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के यूजीसी निरीक्षण के बाद बैठक का आयोजन

निरन्तर प्रगति के लिये विचारों की शक्ति महत्वपूर्ण- प्रो. दूगड़

लाडनूँ, 14 मार्च 2018। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा है कि यह इस संस्थान के समस्त संकाय सदस्यों एवं कर्मचारियों के संयुक्त परिश्रम का फल है कि यूजीसी की टीम यहां से पूर्ण संतुष्ट होकर गई है। वे यहां यूजीसी की 12-बी के तहत एक्सपर्ट्स की पांच सदस्यीय टीम के तीन दिवसीय निरीक्षण के पश्चात टीम द्वारा अपनी विदाई के वक्त विश्वविद्यालय के प्रति संतोष व्यक्त करने के उपलक्ष में विश्वविद्यालय के समस्त संकाय सदस्यों एवं कर्मचारियों की बैठक में धन्यवाद ज्ञापित कर रहे थे। उन्होंने कर्मचारियों को विश्वविद्यालय की शक्ति बताया तथा कहा कि शक्ति का नियोजन सही दिशा में होना आवश्यक है। उन्होंने समस्त कार्मिकों से विचार करने पर जोर देते हुये कहा कि विचारों की शक्ति बहुत महत्वपूर्ण होती है। सोचने की शक्ति से बहुत आगे बढा जा सकता है। उन्होंने कहा कि निरन्तर प्रगति के लिये आइडियाज फ्लोट होने चाहिये एवं संवाद कायम रहना चाहिये। उन्होंने आने वाले समय की चुनौतियों के लिये भी सभी को एकजुट रह कर परस्पर समन्वय से कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया। कुलपति ने विश्वविद्यालय में शाॅपिंग सुविधा उपलब्ध करवाने एवं विभिन्न सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने आगामी 20 मार्च को संस्थान के 28 वें स्थापना दिवस की तैयारियों के लिये जुट जाने की जरूरत भी बताई। कार्यक्रम में जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने इस अवसर पर बताया कि यूजीसी की 12-बी टीम यहां से बहुत प्रभावित हुई है। यहां समस्त संकाय सदस्यो एवं कर्मचारियों में कमिटमेंट, लाॅयल्टी एवं डेडिकेशन की भावना मौजूद है। कुलसचिव वीके कक्कड़ ने कहा कि हम अपनी एकजुटता व परस्पर समझ के कारण सफलता प्राप्त करते हैं। डाॅ. समणी कुसुमप्रज्ञा ने कहा कि यूजीसी की टीम तो यहां की लाईब्रेरी देखकर ही चकित हो गई तथा कहा था कि ऐसी लाईब्रेरी तो बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में भी नहीं मिलती। वे यहां से पूर्ण संतुष्ट होकर गये हैं। दूरस्थ शिक्षा निदेशक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने कार्यक्रम का संचालन किया तथा कहा कि टीम यहां की मेहमानवाजी, स्वच्छता और प्राकृतिक हरीतिमा से प्रभावित हुये हैं तथा अपने उद्गारों में भी इसे मुखर होकर जताया। कार्यक्रम में डाॅ. समणी मल्लीप्रज्ञा व प्रो. दामोदर शास्त्री भी मंचस्थ थे।

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