आचार्य महाप्रज्ञ जन्मशताब्दी वर्ष के अन्तर्गत संचालित कार्यक्रमों के अन्तर्गत आचार्यश्री महाप्रज्ञ की पुस्तक ‘‘कर्मवाद’’ की समीक्षा

कर्म सिद्धांत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के लिये महाप्रज्ञ की कर्मवाद सहायक

लाडनूँ, 11 अक्टूबर 2019। आचार्य महाप्रज्ञ जन्मशताब्दी वर्ष के अन्तर्गत संचालित कार्यक्रमों के अन्तर्गत जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के शिक्षा विभाग के सहायक आचार्य डाॅ. गिरीराज भोजक ने आचार्यश्री महाप्रज्ञ की पुस्तक ‘‘कर्मवाद’’ की समीक्षा प्रस्तुत करते हुये कहा कि 27 अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक की विषय-वस्तु में मनुष्य के अतीत का लेखाजोखा कर्म में निहित बताया है और कर्मवाद को महान सिद्धांत कहा गया है। इसमें महाप्रज्ञ ने बताया है कि अध्यात्म को सटीक रूप में समझने के लिये कर्मशास्त्र, योगशास्त्र एवं वर्तमान मानस शास्त्र मनोविज्ञान का समन्वित अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने बताया है कि कर्म का सम्बंध स्थूल शरीर से नहीं होकर सूक्ष्म शरीर से है। कर्म की वास्तविकता को समझने के लिये आश्रव, संवर, बंध एवं निर्जरा तत्वों का ज्ञान आवश्यक है। इस पुस्तक में कर्म की रासायनिक प्रक्रिया, कर्म का बंध, मोहकर्म, आवेग एवं उनकी चिकित्सा आदि के साथ अतीत, वर्तमान व भविष्य की परस्परता, प्रतिक्रमण, परिवर्तन का सूत्र, भाव का जादू, अकर्म एवं पलायन, कर्मवाद आदि विषयों को लेकर सम्पूर्ण कर्मसिद्धांत की व्याख्या की गई है। महाप्रज्ञ ने इसमें कर्म की रासायनिक प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है तथा इसे रोचक प्रसंगों, परिचर्चा, अंतःक्रियात्मक शैली व दैनिक उदाहरणों से जोड़कर प्रत्येक व्यक्ति के लिये पठनीय और सहज बना दिया गया है।

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